‘न्यू ब्रांड कांग्रेस’ में है ‘आप’ की आत्मा

 

यह कोई साधारण चुनाव नहीं था. गुजरात के लगभग दो महीनों के प्रवास में एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए मैंने हमेशा कांग्रेस के अन्दर आम आदमी पार्टी की ‘आत्मा’ को महसूस किया. कांग्रेस के मुखिया राहुल गाँधी और उनकी जातिवादी राजनीती के तीन सिपहसालारों — HAJ (हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी);  ने जिस प्रकार से गुजरात को झूठ, जातिवाद की  बांटने वाली राजनीती और कभी न पूरे हो सकने वाले खोखले वादों से पाट दिया उससे हमारा यह शक पुख्ता हो गया कि ‘न्यू ब्रांड कांग्रेस’ में आम आदमी पार्टी (आप) की आत्मा है.

इस ‘न्यू ब्रांड कांग्रेस’ में आप की आत्मा होने के बारे में मेरा पहला शक तब हुआ जब  HAJ ‘हज’ की तिकड़ी ने झूठ बोलना और आधारहीन आरोप लगाना शुरू कर दिया. क्षात्र राजनीती से लेकर अब तक के अपने राजनीतिक जीवन में मैंने इस स्तर का झूठ सिर्फ दिल्ली में आप के नेताओं खासकर आप के मुखिया अरविन्द केजरीवाल के मुंह से दिल्ली विधान सभा के चुनाव में सुना था. हमारा यह शक दो घटनाओं से और पुख्ता हो गया. पहला – हज के सबसे ताकतवर नेता हार्दिक पटेल जो कि सुप्रीम कोर्ट और  संवैधानिक संस्थाओं की भी आलोचना कर रहे थे और गुजरात के मुख्यमंत्री को भी कुछ नहीं समझते थे अचानक कांग्रेस के आगे भीगी बिल्ली बन गए और ५०% से ऊपर आरक्षण देने के कांग्रेस के जबानी वादे से संतुष्ट हो गए. कांग्रेस ने कभी इस वादे को पूरा करने की रणनीति नहीं बताई. दूसरा – इस पूरे चुनाव में आप का अचानक गायब हो जाना. जो आप और उसके मुखिया अरविन्द केजरीवाल कुछ महीने पहले तक  प्रधानमंत्री मोदी को गुजरात में ललकार रहे थे वो पूरे चुनाव में गुजरात में दिखाई नहीं दिए. हालाँकि आप ने २९ सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन आप का एक भी बड़ा नेता यहाँ तक कि गुजरात प्रभारी गोपाल राय भी गुजरात में दिखाई नहीं दिया. ये २९ प्रत्याशी भी काफी पहले घोषित कर दिया गए थे. अब तक किसी राज्य में इतनी कम सीटों पर चुनाव लड़ना और प्रचार न करना आप के अब तक के इतिहास का अकेला उदहारण है. आप ने उत्तर प्रदेश के स्थानीय चुनाओं में भी प्रचार किया लेकिन गुजरात में कांग्रेस के पक्ष में समर्पण कर दिया. कुछ महीने पहले तक आप के नेता अपने कार्यकर्ताओं की संख्या दिखाने के लिए अपने गुजरात के कार्यक्रमों की फोटो और विडियो सोशल मीडिया पर डालते थे. चुनाव में वो सारे कार्यकर्ता कहाँ गायब हो गए ?  क्या यह सब कांग्रेस के इशारे पर किया गया? आप को मीडिया का व्यापक कवरेज मिलता है लेकिन गुजरात में शायद ही किसी प्रत्याशी को मीडिया ने महत्व दिया हो. पूरे चुनाव में आप के किसी भी नेता को हमने गुजरात चुनाव के सन्दर्भ में टीवी पर भी नहीं देखा. यह मीडिया मैनेजमेंट किसने किया? यह मात्र संयोग नहीं हो सकता.

जिस प्रकार दिल्ली के चुनाव में आप के मुखिया अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर झूठे और निराधार आरोप लगा रहे थे उसी तर्ज पर कांग्रेस के शहजादे राहुल गाँधी और उनकी जातिवादी राजनीती की तिगडी – हज; भी झूठे और निराधार आरोपों की बौछार कर रहे थे. हज के नेता अल्पेश ठाकोर ने आरोप लगाया कि “मोदी जी गोरा होने के लिए ताइवान का मशरुम खाते हैं जिसकी कीमत ८०,००० रुपये प्रति मशरुम है और मोदीजी प्रतिदिन चार मशरुम खाते हैं” और राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि “मोदी जी उद्योगपतियों को ८०,००० करोड़ एकड़ जमीन दे दी (संपूर्ण पृथ्वी की कुल भूमि का तीन गुना से ज्यादा)”. ये आरोप अब तक की भारतीय राजनीती  में सबसे निम्न स्तर के झूठे आरोपों में गिने जायेंगे जिसमे आप के मुखिया को महारत हासिल है.

कांग्रेस के युवराज और उनके सिपहसलार गुजरात में बेरोजगारी के आंकड़े को ५० लाख से ३० लाख के बीच बदलते रहे. वास्तविकता यह है कि गुजरात सर्वाधिक रोजगार पैदा करने वाले राज्य है और यहाँ पर औद्योगिकीकरण के कारण बेरोजगारी लगभग न के बराबर है. दूसरे राज्यों से यहाँ तक कि राहुल गाँधी के संसदीय क्षेत्र  अमेठी से भी बहुत से लोग गुजरात में रोजगार के लिए आते हैं. मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री के रूम में मल्लिकार्जुन खड्गे, जो की वर्तमान में लोक सभा में कांग्रेस के विपक्ष के नेता हैं, ने 2010 ने गुजरात को भारत के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रोजगार पैदा करने में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए पुरस्कार दिया था. अब उनकी कांग्रेस पार्टी कहती है की मोदी के विकास मॉडल में गुजरात में रोजगार पैदा ही नहीं हुआ.  

कांग्रेस ने इस देश में ये मानसिकता बना दी है कि की रोजगार का मतलब ‘सरकारी नौकरी’ जिसके कारण आज भी कई ऐसे युवा जो की स्वरोजगार या प्राइवेट कंपनी में रोजगार में लगे होते हैं वो भी रोजगार कार्यालय में पंजीकृत होते हैं. मोदीजी के नेतृत्व में ‘गुजरात मॉडल’ के अंतर्गत भाजपा की सरकारों ने इस मानसिकता को काफी हद तक बदल दिया है. गुजरात में औधिकीकरण के कारण निजी क्षेत्र में रोजगार के व्यापक अवसर हैं साथ ही मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप आदि योजनायों से युवाओं का सशक्तिकरण हो रहा है और अब युवा रोजगार देने वाले भी बन रहे हैं.

इसी प्रकार का झूठा प्रचार दिल्ली विधान सभा चुनाओं में पेट्रोल और सी एन जी की कीमतों को लेकर अरविन्द केजरीवाल ने किया था. केजरीवाल ने चर्चों पर कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को उछालकर भाजपा को इसाई समुदाय का विरोधी बताने का  घृणित प्रयास किया और उसमे कुछ सीमा तक सफल भी हुए उसी प्रकार गुजरात के ऊना में दलितों पर हुए अमानवीय अपराध जो हज के माध्यम से कांग्रेस ने भुनाया. दिल्ली में आप ने महत्वपूर्ण स्थानों और बसों में सी सी टी वी कैमरा और सिक्यूरिटी गार्ड, नयी बसें, पूरी दिल्ली में वाई फाई, क्षात्रों के लिए ऋण गारंटी, नए हॉस्पिटल, फ्री पानी और बिजली जैसे अनेक ऐसे वादे किये जो तीन साल बाद भी पूरे नहीं कर सके. इसी तर्ज पर कांग्रेस ने ५०% की सीमा से ऊपर पाटीदारों को ५ % आरक्षण, बेरोजगारी भत्ता, सस्ती शिक्षा जैसे अनेक वादे किये. कांग्रेस के वादों का खर्च लगभग १.१० करोड़ रुपये आँका गया जबकि गुजरात का कुल बजट लगभग ७०,००० करोड़ रुपये है. कांग्रेस के लगभग सभी राज्यों में सरकार रह चुकी है. अब तक कांग्रेस ने कितने राज्यों में बेरोजगारी भत्ता दिया है ? क्या कांग्रेस कर्णाटक और पंजाब में बेरोजगारी भत्ता देगी ? 

जो राजनीतिक विश्लेषक ‘न्यू ब्रांड कांग्रेस’ और राहुल गाँधी का नया ‘अवतार’ कहकर गुजरात में नेहरु वंश के छठे कांग्रेस अध्यक्ष की हर को भाजपा की जीत से भी बड़ा बताने और प्रचार करने में व्यस्त हैं, उनसे मेरा एक प्रश्न है. जातिवाद के जहर की राजनीती ‘न्यू ब्रांड’ कैसे है? इसी कांग्रेस ने 1980 के दशक में पिछड़ी जातियों को १०% आरक्षण देने के नाम पर गुजरात को जातिवादी और सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया था. तब कांग्रेस ने पटेलों को आरक्षण से बाहर रखा और खाम (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुल्सिम) की जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति की जिसमे गुजरात के १०० से ज्यादा लोगों की जान चली गयी. कांग्रेस ने इस जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति की फसल नब्बे के दशन के मध्य तक काटी. इसी जहर से कांग्रेस को १९८५ में सर्वाधिक १८२ में से १४९ सीटें मिली थी. अस्सी के दशक में कांग्रेस ने खाम की राजनीती की और अब कांग्रेस हज की राजनीती कर रही है. हज की जातिवादी राजनीती में २०१६ में लगभग १० गुजरातियों की जान गयी और हजारों करोड़ की संपत्ति नष्ट कर दी गयी. ये आग भी कांग्रेस ने हज के द्वारा लगवाई. तब पटेलों को बाहर करने के नाम पर गुजरात में जातिवाद का जहर बोया और खाम बनाकर राजनीति की रोटी सेंका और २०१६-१७ में अब पटेलों को आरक्षण में लाने के लिए जातिवाद का जहर बोने और काटने का काम कर रही है. वस्तुतः कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए हमेशा लोगों को बांटने की राजनीती की है. कांग्रेस हिंदुयों को जाति के नाम पर बाँटती है और मुसलमानों को धर्म के नाम पर इकठ्ठा करती है. कुछ जातियों को मुसलमानों में जोड़कर सरकार बना लेना ही कांग्रेस की राजनीती रही है. गुजरात में कांग्रेस मुसलमानों को लेकर इतना आश्वस्त थी कि न तो राहुल गाँधी और न ही कांग्रेस के किसी नेता ने पूरे चुनाव में मुसलमानों का नाम लिया. गुजरात की जनता ने अब कांग्रेस की इस जादिवादी जहर की राजनीति को पहचान लिया है. इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि कांग्रेस के दो बड़े नेता शक्तिसिंह गोहिल और अर्जुन मोद्वाडिया चुनाव हार गए.

गुजरात का चुनाव इस बात में अद्भुत था कि एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हम सभी भाजपा कार्यकर्ता विकास की राजनीती के लिए जनता से समर्थन मांग रहे थे तो दूसरी तरफ सभी जातिवादी और विभाजनकारी ताकतें जहर उगल रही थी. यह चुनाव में एक ओर मोदी का विकासवाद था और दूसरी ओर सभी जातिवादी और विभाजनकारी ताकतें जिसमे कांग्रेस, आप, हज, एन जी ओ, विश्विद्यालयो के प्रोफेसर, छात्र नेता, चीयर लीडर्स, वामपंथी ताकतें, वामपंथी बुद्धिजीवी, मीडिया के वामपंथी, और कई प्रकार के पार्ट टाइम नेता भी शामिल थे. गुजरात की जनता ने विकास को चुना है और इन विभाजनकारी ताकतों को मजबूती से परास्त किया है. इस चुनाव में हमने भी सबक सीखा है और इसको आगे प्रयोग भी करेंगे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित भाई शाह के नेतृत्व में भाजपा का हर कार्यकर्ता अब हर चुनाव में जीत के संकल्प के साथ और अधिक मजबूती से लडेगा.

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